2011/02/09

ज़िन्दगी क्या है.................

ज़िन्दगी क्या है ,इक आभाव है
वस्तुओं का , कामनाओ का , इच्छाओं का ,
या के बहाव है  भावनाओ का ,
कभी क्रोध  के रूप मैं ,कभी प्यार के रूप मैं
ज़िन्दगी दर्द है ,
कुछ नहीं होने का ,कुछ ना कर सकने का ,
ज़िन्दगी लालसा है ,
विचार है कुछ पाने का , कुछ हासिल करने का 
या के ज़िन्दगी है नाम जीने का ,आपनी आजादी के साथ
मगर कहा है आजादी ,कहा है जीवन,
ज़िन्दगी नाम है तड़प का ,जलन का ,
किसी को पाने कि तड़प ,किसी को खोने कि जलन,
या के जिन्द्की सपना है ,सब कुछ भूल जाने का ,
जो है उसको पाने का ,जो नहीं है उसके लिए आंसू बहाने का ,
ज़िन्दगी हकीकत है ,या के इक कल्पना है ज़िन्दगी,
हाथ लगा के उसको छू के देखूंगा कभी ,
ज़िन्दगी मेरे विचारो का संकलन मात्र है,
या के किसी और का संग्रह चुरा के बैठा हूँ मैं ,
ज़िन्दगी है कोई रिश्ता ,माँ का बाप का ,
या रिश्ता है दोस्ती का ,भाई का ,
जो चलेगा साथ जब तक तू चलेगा ,
तेरे साथ ही हो जायेगा दफ़न जमीं मैं,
या के ज़िन्दगी छितिज पे मिलता कोई किनारा है ,
तेरी उमीदों का धरातल जहा तेरा घर है,
जहाँ  सांस लेता है तू चैन से,
 बैठ कर आराम करता है ,
मगर जब याद आता है कि काम करना है बहुत ,
जवाब देना है ज़िन्दगी देने वाले को ,
तो समेट  कर सारी पोटली अपनी ,
जिसमे ज़िन्दगी के मायने सहेज रखे है ,
क्या मिला ,क्या खोया ,ज़िन्दगी है क्या ,
ये बताने चल पड़ता है ,ना जाने कहा !
दूर किसी डगर पार अनवरत चल पड़ता है
मगर जवाब अभ भी नही है ,
ज़िन्दगी क्या है ,ज़िन्दगी क्या ,
ओर मौत आके ले जाती है तुझे तेरे
जज्बात ,कल्पनाएँ ,रिश्ते,क्रोध ,प्यार सब कुछ
वही पर छोड़ कर वैसे ही छोड़ कर,
रोते बिलखते ,सब्द हिन् ,
और छोड़ जाता है इक सवाल,
ज़िन्दगी क्या है..............................

2011/02/07

ये गीत पुराना है

ये गीत पुराना है ,ये राग पुराना है ,
इक गया है इक को आना है,
कल वो भी नया था जो आज पुराना है,
क्यों दोष दे किसी को ,
जब ये चलता है ये ही चलाना है ,
इक उठता है ,इक जमता है ,
ये ही तो जमाना है !
ये गीत पुराना है ,ये राग पुराना है !
तुम ही तो कहते थे भगाओ इसको ,
मुझको भी तो आना है,
मैं नया हूँ  ; बिलकुल नया हूँ ;
ये तो पुराना है ,
ये गीत पुराना है ,ये राग पुराना है !
आया है जो सामने से ,
चुपके भी तो आ सकता था  ,
है पुराना लेकिन;
नया बन के भरमा सकता था ,
लेकिन कब तक ,
कब तक वो राग नए गा पता ;
आखिर सब समझ जाते .........
ये गीत पुराना है ,ये राग पुराना है !
जाना है वैसे भी उसको जो पुराना हो गया है ,
बस उसको ये समझना है ,
फिर तुमको आ जाना है ,
ये गीत पुराना है ,ये राग पुराना है !
पर ये ना समझना कि तुम शास्वत हो जाओगे ,
तुम नए हो ;
पर कल पुराने हो जाओगे ,
जैसे ये जायेगा कल  तुम को भी जाना है ,
ये गीत पुराना है ,ये राग पुराना है !

2011/02/05

आग

धुंआ नहीं उठता और आग जल जाती है -२ ,
इश्क ऐसी भट्टी है ,जो सब कुछ निगल जाती है !
तेरे,मेरे चाहने से  ना जलती है ,ना भुजती है -२ ,
अपने आप सुलग जाती है ,यूँ ही जल जाती है !

2011/01/30

बेटी जा रही है ........

जब इक बहु आपनी सास से दूर अपने पति
के पास जाती है तो उस शास कि भावनाएं 
जो अपनी बहु को बेटी कि तरह प्यार करती है ....

एक घर कि बेटी हो के पराई आई थी ,
आज फिर परायी सी होने जा रही है ,
दूर अपने सास ससुर से कहीं........
घर बसाने बेटी जैसे जा रही है ,
घर बसाने मेरी बेटी जा रही है !

जब आई घर में तो लगा के रोनक आई,
आज बेटी लेके रोनक आपने साथ जा रही है ,
बड़ी मुश्किल से अपना बनाया था परायी बेटी को,
आज कर के वही पराया जा रही है...........
घर बसाने मेरी बेटी जा रही है !

खुशी है मगर आँखों में आँसूं भी तो है,
ग़म है तो उसके दूर जाने का,
आदत डाल दी उसने अपने प्यार कि,शरारत कि,
आठ्खेलियों कि ...............
मगर कर के मेरा आँगन सूना जा रही है ,
घर बसाने मेरी बेरी जा रही है !

रोक भी नहीं सकती उसको,रोकू भी तो कैसे ,
पति कि है चिंता उसको ,पास पति के जा रही है ,
सेवा कि हमारी अब,पत्नी धर्म निभाने जा रही है,
लेके आशीर्वाद आपना घर बनाने जा रही है ,
धर्म निभाने जा रही है..............
घर बसाने मेरी बेटी जा रही है !

याद आएगी तेरी बेटी हर पल मुझे मैं जानती हूँ ,
कभी-कभी समझाना पड़ेगा खुद को मैं जानती हूँ ,
वो बेटी तुझ से दूर है मगर दिल के तो करीब है ,
जब भी बुलाएगी,आएगी कर के ये वादा जा रही है ,
घर बसाने मेरी बेटी जा रही है !

चिंता है ध्यान खुद का केसे रखेगी वो,
बच्ची मेरी तू दिल वहां अकेले लगाएगी कैसे ,
नादाँ है तू खुद को वहां संभालेगी कैसे ,
भूल ना जाना वहां जा के अपनी इस माँ को...
मै सास हूँ मगर माँ कि तरह रुला कर जा रही है ,
घर बसाने मेरी बेटी जा रही है ........,

2011/01/12

सोचता हु में.................

में रास्तों से गुजरता अक्सर ये सोचता हूँ  ,
टीस मन में मेरे किस चीज कि है ,
दिल में दर्द है इस ज़माने कि मेहरबानी ,
खुशियों के दो पल ज़माने में ढूँढता हूँ !
कभी सोचता हूँ दीप बिन तेल के ,
झिलमिला के जल तो उठे ;
लेकिन भुज जायेंगे झक से !
फूँक मरकर इनको भुजाना  ना पड़ेगा ,
आँखों से बहते झरनों से ख़ुशी को छंट लो ,
या के इनको इक्कठा कर लो पाती में !
कभी आग भुजाने के काम आयेंगे ,
या के प्यास तो भुजेगी किसी कि !
इन रास्तों पे गुजरता अक्सर सोचा करता हूँ !
वो दीपक जो मेरा रह्बरा बना है ,
क्यों उसके रास्तों पे क़दमों में अँधेरा है ,
मुझे तो वो नदिया के ऊपर का पूल दिखायेगा ,
टूटी सड़क का गड्डा वो कैसे दिखा पायेगा !
रास्तों के मोड़ पे रुक कर थोडा आराम करके ;
फिर मेरा मन इस ज़माने पे आंसू बहता है ,
मेरी आँखों से निरंतर बहती अश्रुधारा नहीं रूकती ,
क्यों इस अश्रुजल पर आकाल आता नहीं !
अक्सर सोचता हुआ फिर चल पड़ता हूँ ,
कई मंजिले आती है कई तलाशता हूँ ,
कभी खुशियाँ दे देती है पगडंडीयां ,
कभी दर्द नदियों के टूटे पूल दे देते हैं,
नदियाँ कई तैर के पार कि है मैने  ,
कई सडको के गड्डे छाने है मैंने ,
मुझे ना कही सुकून मिलता है ना खुशी,
मगर फिर भी चलता रहता हु मंजिल दर मंजिल ,
फिर भी इक जयोत है दिल में निरंतर जलती !
अक्सर इन रास्तों से गुजरता सोचता हु में !